मेहतागढ़ मेनार में ऐतिहासिक महापर्व जमराबिज इस बार 8 मार्च को मनाया जाएगा, नजारा होगा दिवाली सा
कार्यक्रम को लेकर तैयारियां शुरू, इस दिन मेवाड़, मालवा सहित मध्यप्रदेश से हज़ारों जुटेंगे लोग
8 मार्च को मेनार बनेगा एक सैनिक छावनी, युद्ध का परिदृश्य जीवंत हो उठेगा
बाँसड़ा,कन्हैयालाल मेनारिया । राजस्थान संस्कृति और परंपराओं का खजाना है, जहाँ विभिन्न संस्कृति और परंपराओं का अद्भुत समावेश है। वही होली अल्हड़ मस्ती का त्यौहार है। देश के विभिन्न हिस्सों में होली मनाने के कई रिवाज प्रचलित हैं, लेकिन उदयपुर जिले के मेहतागढ़ मेनार की होली सबसे अनूठी मानी जाती है। यहां होली के मौके पर दिवाली सा नजारा दिखाई देता है। मेनार में रंग और फूलों से नहीं, पटाखे और बारूद से होली खेली जाती है। आधी रात तक ओंकारेश्वर चौक पर युद्ध का परिदृश्य जीवंत हो उठता है। ग्रामीण पारंपरिक वेशभूषा धोती, कुर्ता, कसुमल पगड़ी पहने ग्रामीणों की टोली और गरजती तोपें, हवा में लहराती बंदूकें, हाथों में तलवारें और भव्य आतिशबाजी के साथ होली के तीसरे दिन मनाया जाने वाला शौर्य, वीरता का प्रतीक ऐतिहासिक त्यौहार जमराबिज इस बार 8 मार्च को मनाया जाएगा, जिसके आसपास के गाँवो सहित मेवाड़ के उदयपुर, राजसमंद, चित्तौड़गढ़, डूंगरपुर, निम्बाहेड़ा, मालवा एवं मध्यप्रदेश के हज़ारों लोग साक्षी बनेंगे।
ऐतिहासिक महापर्व जमराबिज चैत्र कृष्ण पक्ष द्वितीया 8 मार्च को मेनार प्राचीन ठाकुरजी मंदिर ओंकारेश्वर चौक में मनाए जाने वाले पर्व की तैयारियों में ग्रामीण जुट गए है। 1 से 17 फरवरी एवं 22, 23 फरवरी को शादियों के शुभ लग्न मुहूर्त पुर्ण होने पर अब ग्रामीण इस ऐतिहासिक महापर्व के लिए बंदूकें, तलवारे एवं तोपो की साफ सफाई तथा आतिशबाजी के लिए पटाखों की खरीदारी शुरू कर दी है। वही अपनी पारंपरिक वेशभूषा के लिए भी कई युवा धोती, कुर्ता तैयार करवा रहे है, जिससे टेलर के यहाँ भीड़ पड़नी शुरू हो गयी है। वही इस पूरे कार्यक्रम को लेकर पुरे गांव को एक दुल्हन की तरह सजाया जाएगा तथा 8 मार्च को ओंकारेश्वर चौक चकाचौंध सी रोशनीयो से नहाया हुआ रहेगा।
500 सालों से शौर्य, वीरता का मना रहे है पर्व
मुगलों की सेना को शिकस्त देने के उत्साह में पिछले 500 साल से मेनार में गोला-बारूद की होली खेली जाती है। इस बार ये बारूद की होली 8 मार्च को खेली जाएगी। इतिहासकार बताते हैं कि पिछले 500 साल से इस परंपरा का निर्वहन बदस्तूर जारी है। दरअसल मुगलों की सेना को इस इलाके के रणबांकुरों ने अपने शौर्य और पराक्रम के बल पर शिकस्त दी थी, उसी खुशी में जमराबीज के दिन यहां की अनूठी होली मनाई जाती है।
यह है इतिहास
जब मेवाड़ पर महाराणा अमर सिंह का राज्य था। उस समय मेवाड़ की पावन धरा पर जगह जगह मुगलो की छावनिया (सेना की टुकडिया) पड़ी हुई थी। इसी तरह मेनार में भी गाँव के पूर्व दिशा में मुगलो ने अपनी छावनी बना रखी थी। इन छावनियो के आतंक से नर नारी दुखी हो उठे थे। इस पर मेनारवासी मेनारिया ब्राह्मण भी मुग़ल छावनी के आतंक से त्रस्त हो चुके भगवान् परशुराम के वंशज एव महाराणा उदयसिंह के रक्षक कब तक सहते। जब मेनारवासियों को वल्लभनगर छावनी पर विजय का समाचार मिला तो गाँव के वीरो की भुजाये फड़क उठी गाँव के वीर ओंकारेश्वर चबूतरे पर इकट्ठे हुए और युद्ध की योजना बनाई गई। उस समय गाँव छोटा और छावनी बड़ी थी। समय की नजाकत को ध्यान में रखते हुए कूटनीति से काम लिया। इस कूटनीति के तहत होली का त्यौहार छावनी वालो के साथ मनाना तय हुआ। होली और धुलंडी साथ साथ मनाई गई। चेत्र माघ कृष्ण पक्ष द्वितीय विक्रम संवंत 1657 की रात्रि को राजवादी गैर का आयोजन किया गया गैर देखने के लिए छावनी वालो को आमंत्रित किया गया। ढोल ओंकारेश्वर चबूतरे पर बजाया गया। नंगी तलवारों, ढालो तथा हेनियो की सहायता से गैर खेलनी शुरू हुई। अचानक ढोल की आवाज ने रणभेरी का रूप ले लिया। गाँव के वीर छावनी के सैनिको पर टूट पड़े। रात भर भयंकर युद्ध चला। ओंकार माराज के चबूतरे से शुरु हुई लड़ाई छावनी तक पहुँच गई और मुगलों को मार गिराया और मेवाड़ को मुगलो के आतंक से बचाया। जिसको लेकर आज मेनार में उनकी याद में शौर्य और वीरता पर्व मनाया जाता है।
