ऋषभदेव मानव सभ्यता व संस्कृति के जनक : आचार्य पुलक सागर
ऋषभदेव,डीपी न्यूज नेटवर्क । भारत गौरव राष्ट्र संत आचार्य पुलक सागरजी महाराज श्री भट्ठारक यश कीर्ति दिगंबर जैन गुरुकुल में आयोजित ऋषभ कथा एवं महा अर्चना विधान के पांचवें दिन कथा वाचन करते हुए कहा भगवान ऋषभदेव मानव सभ्यता के जनक थे ,उनके समय भोग भूमि कर्म भूमि में परिवर्तित हो गई चारों ओर जीवनयापन की समस्या पैदा हुई तब भगवान ने प्रजा को कृषि एवं ऋषि का मंत्र दिया।

उन्होंने प्रजा को खेती करना फसल उगाना को सिखाया उन्होंने ऐसी असी मसी कृषि शिल्प उद्योग एवम वाणिज्य की शिक्षा दी। अपनी रक्षा करने के लिए तलवार चलाना, लेखन कार्य, कृषि कार्य सिखाया। उन्होंने जीवन जीने की कला बताई। उन्होंने 72 कलाओं को जीवन में आवश्यक बताया उनके 101 पुत्र एवम 2 पुत्रियां थी, उनके बड़े पुत्र चक्रवती भरत 6 खंड के स्वामी थे उन्हीं के नाम से इस देश का नाम भारत पड़ा, उनकी दो पुत्रियां ब्राह्मी एवं सुंदरी थी, ब्राह्मी को अक्षर ज्ञान कराया जिससे देवनागरी लिपि का आविष्कार हुआ। सुंदरी को अंक ज्ञान सिखाया नारी शिक्षा एवम समानता के पक्षधर थे, उनके पुत्रों को ज्योतिष शास्त्र, संगीत ,भूगोल, चित्र कला का ज्ञान दिया ।

सामाजिक व्यवस्था के लिए तीन वर्णों की स्थापना कर मानव जाति को उपकृत किया। समाज के महामंत्री प्रदीप गनोडिया ने बताया की इस मौके पर राज कुमार ऋषभ का विवाह यस्वती सुनंदा के साथ का सुंदर प्रस्तुतिकरण किया , बाद में ऋषभदेव के पुत्र भरत एवम बाहुबली के बीच युद्ध के दृश्य बताए । चक्रवती भारत सुमेश मधु वानावत के छः खंडो स्वामी के विजय यात्रा निकाली गई। इससे पूर्व प्रतिष्ठाचार्य पंडित सुधीर मार्तंड ने आचार्य भक्ति कर कथा की शुरुवात के लिए निवेदन किया और कहा यौवन को और तीर्थंकर अग्रसर हुए वो बिंब जिसका देवराज इंद्र इंद्राणी ने श्रृंगार किया था जिनका राज्यअभिषेक ,राजमुकूट पहनाया गया।

कथा के बाद में तीर्थंकर भगवान का पाणिग्रहण करवाया गया वरमाला पहनाई गई । यासस्वी को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई निलंजना का नृत्य देख कर वैराग्य प्राप्त हुआ ।
सांयकालीन छः खण्ड के अधीपती राजा भरतेश्वर की द्विगविजय यात्रा 5.30 बजे सुमेश मधु परिवार केसर सदन पगल्याजी से किका भाई धर्मशाला होते हुए वापस गुरुकुल में पहुची जहाँ भव्य स्वागत सम्मान हुआ। उसके बाद भरत बाहुबली का युद्ध हुआ। सांयकालीन गुरुदेव द्वारा कथा वाचन किया गया उसके पश्चात महाआरती की गई।
