नाग पंचमी : साँपो के देवता गातोड़ जी मंदिर आस्था का केंद्र
महेंद्र शर्मा, डीपी न्यूज नेटवर्क ।
सलूंबर जिले के जयसमंद के समीप वीरपुरा ग्राम पंचायत में गातोड़जी मंदिर नाग देवता के न्याय के लिए प्रसिद्ध है। यहां नाग देवता गातोड़जी की बांबी की पूजा होती है। यहां पर श्रद्धालु अपने घर में चोरी सहित अन्य घटनाओं को सुलझाने के लिए भी आते हैं। मान्यता है कि दो पक्षों में सच-झूठ का फैसला भी होता है। पुजारी के अनुसार प्राथी और आरोपी दोनों ही पक्ष की बुलाया जाता है। सवाल-जवाब के बाद पहले प्रार्थी पक्ष को केसर पिलाई जाती है। केसर पी लेना मतलब वह फैसले के लिए सहमत हैं और अपनी ओर से 100% बात सही है। फिर दूसरे पक्ष से सवाल-जवाब करके उसको केसर पिलाई जाती है। लोगों की मान्यता है कि यहां पर जो भी समय 5-10 दिन का दिया जाता है, इसके अंदर अंदर जिसकी भी गलती होती है, इस समयावधि में दोषी को शारीरिक रूप से नुकसान होता है। पूजा पद्धति में गातोड़जी को कैसर दूध का भोग लगाया जाता है। जो श्रद्धालु पूजन करना चाहता है, वह दूध और केसर लेकर आता है विधि-विधान, मंत्रोच्चार के साथ उसके हाथ पर केसर दूध का लेप करने के बाद बांबी में हाथ उलवाया जाता है। मान्यता के अनुसार लोक देवता गातोड़जी हाथ से केसर को सीख लेते हैं। पूजा के लिए गुजरात से आए चार विप्र परिवार के रहने के कारण इस गांव का नाम वीरपुरा पड़ा। साथ ही लोक देवता गोविंद सिंह चौहान को पास में ही गातोड़ गांव होने से गातोड़ श्याम के नाम से जाना जाने लगा। जयसमंद झील भी इस मंदिर के बाद बनी। रोजाना लगभग 1000 श्रद्धालु दर्शन करने के लिए आते हैं। रविवार को विशेष पूजा होने के कारण 5000 से अधिक श्रद्धालु आते हैं। बांबी पूजन के लिए रोजाना 5-7 श्रद्धालु आते हैं।गातोड़जी मारवाड़ में गोगाजी के नाम से प्रसिध्द है और मेवाड़, वागड़, मालवा में गातोड़जी (गातरोड़जी) के नाम से। गातोड़जी चौहान को कई भक्त गौवर्धनसिंह चौहान भी कहते हैं। इनका जन्म ददरेवा (ददरगढ़) चुरू में चौहान वंश के राजपूत राजा जेवरसिंह के घर आज ही के दिन विक्रम संवत 1003 में यानी भाद्रपद कृष्णा नवमी को हुआ एवं इनकी माता का नाम रानी बाछल था इनका विवाह श्रीयल के साथ हुआ तथा इनके दो भाई अर्जन और सर्जन थे। इनका जन्म गुरु गोरखनाथ के आशीर्वाद से हुआ तथा गुरु गोरखनाथ ने इन्हें गुरु दीक्षा प्रदान की व साथ ही साथ आध्यात्मिक, योग एवं आयुर्वेद की शिक्षा प्रदान की तथा गुरु गोरखनाथ ने ही इन्हें सांप का जहर उतारने की कला भी सीखाई थी, तबसे इन्हें सांपों का देवता भी कहा जाता है यह मंदिर उदयपुर जिले से 50 किलोमीटर दूर जयसमंद झील के पास वीरपुरा नामक स्थान पर स्थित है
लोक मान्यता है की यहाँ पर स्वयं भगवान शंकर ने गोगाजी को स्थान दिया था अर्थात शिवलिंग यहाँ से अंर्तध्यान हो गया और वहां जाहर वीर गोगाजी महाराज ने समाधि ले ली। आज भी उस स्थान पर गातोड़ जी का शिखरबंद मन्दिर बना हुआ है परन्तु वहाँ पर शिवलिंग नहीं है। यहाँ पर आने वाले भक्त उस समाधी वाले स्थान पर जहां गड्डानुमा (बांबी) स्थान बना हुआ है मान्यता है की यहाँ से दूध चढ़ाते थे तो वो दूध उज्जैन निकलता था भक्तों द्वारा अपने हाथ पर केसर लगाकर उन्हें (गातोड जी )को अर्पण करते हैं। केसर अर्पण, पूजा का कार्य वंशानुगत ओसरे के अनुसार सेवारत पुजारी द्वारा सम्पत्र कराया जाता है जो कि सनातन धर्म में विश्वास रखने वाला, सात्विक वृति का कोई भी व्यक्ति मंदिर की निर्धारित मर्यादानुसार कर सकता है। यह भी मान्यता है की यहाँ पर अपने पूर्वजों और देवी देवताओं की मूर्ति स्थापना करने से पहले उस मूर्ति की पूजा यहाँ पर की जाती है उसके बाद वो मूर्ति बिठायी जाती है तथा यहाँ सच और झूठ का न्याय भी कराया जाता है शारदीय नवरात्री के ग्यारस और बाहरस 2 दिन का मेला भरता है
यहाँ दर्शन के लिए मेवल छप्पन वागड़ के साथ मेवाड़ मारवाड़ मालवा गुजरात मध्य प्रदेश से भक्त आते है और पूजा अर्चना करके अपनी मनोकामना पूर्ण करते है रविवार के दिन मंदिर में विशेष पूजा अर्चना और आरती होती है इस दिन भक्तों की भीड़ लगी रहती है
