मेहतागढ़ मेनार में मेवाड़ी पोशाक में दहाड़ेंगे रणबांकुरे, जमरा बीज पर खेली जाएगी बारूदों की होली

8 मार्च को ओंकारेश्वर चौक गूंजेगा बंदूकों, तोपो से, गूंज 5 किलोमीटर तक सुनाई देती है

बाँसड़ा,कन्हेयालाल मेनारिया । उदयपुर जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में कई ऐसी परंपराएं प्रचलित है जिनकोआज भी ग्राम वासियों ने कायम रखा हुआ है। जब पूरा प्रदेश एक तरफ विभिन्न प्रकार के रंगों से होली की खुशियां मनाते हैं। वहीं दूसरी तरफ मेनार गांव में लोग बारूदों से होली खेलकर जीत का जश्न मनाते हैं। दरसल वल्लभनगर उपखण्ड क्षेत्र के मेनार गांव में प्रसिद्ध जमराबीज का पर्व 8 मार्च बुधवार को बड़े उत्साह के साथ मनाया जाएगा। गांव में होली पर्व पर दिवाली जैसा नजारा देखने को मिलेगा। मेवाड़ी पोशाक धारण करके जब रणबांकुरे दहाड़ेगे तो मुगलों से युद्ध का परिदृश्य जीवंत हो उठेगा। दरसल मुगलों की टुकड़ी पर विजय के प्रतीक इस जश्न में रणबांकुरे ढोल की थाप पर गेरिये गैर-गैर घूमते हुए नाच गान कर शौर्य का प्रदर्शन करेंगे। शौर्य पर्व जमराबीज पर जबरी गैर में शामिल होने और साक्षी बनने हजारों लोग मेनार गांव पहुंचेंगे। गांव के मुख्य ओकारेश्वर चौक में सतरंगी रोशनी से सजावट की जाएगी। इस आयोजन में पांच मशालची गांव के पांचों मुख्य मार्ग पर तैनात किए जाएंगे। इसके बाद पांचों समूह ठाकुरजी मंदिर से ओकारेश्वर चबूतरे के यहां पहुंचकर एक साथ एक समय पर हवाई फायर व आतिशबाजी करेंगे। मुख्य चौक युवाओं द्वारा सबसे ज्यादा पटाखे फोड़े जाएंगे। इस दौरान गरजती बंदूक और तोपो के साथ शमशीरे भी चमचमाई हुई प्रतीत होगी। महिलाएं सिर पर कलश धारण किए वीर रस के गीत गाती हुई चलेगी। मुख्य चौक में आतिशबाजी के बाद पांचों दलों के सदस्यों द्वारा हवाई फायर किए जाएंगे।
दरअसल मेनार गांव ने मुगलों से युद्ध लड़ कर मेवाड़ की रक्षा में अहम भूमिका निभाई थी। मुगलों से हुए युद्ध में विजय की खुशी का जश्न मनाने के लिए हर साल ग्रामवासी बारूद की होली खेलते हैं। गांव वालों का मानना है की मुगल काल में महाराणा अमर सिंह के समय मेनार के यहां मुगल सेना की चौकी थी। जिसे मेनारिया ब्राह्मणों ने कुशल रणनीति से लड़ाई कर चौकी को ध्वस्त किया था। इसी की खुशी में सालों से जमराबीज पर जश्न मनाने की यह परंपरा चली आरही है। मुगलों पर विजय के उपहार में तत्कालिन महाराणा ने मेनार को 17वें उमराव की उपाधि प्रदान की थी। यही नही, मेनारवासियों से 52 हजार बीघा जमीन पर लगान तक नही वसूला गया। मेवाड़ के महाराणा अमरसिंह प्रथम ने मुगलों पर विजय की खुशी में मेनार के ग्रामीणों को शौर्य के उपहार स्वरूप शाही लाल जाजम, नागौर के प्रसिद्ध रणबांकुरा ढोल, सिर पर किलंगी धारण करने का अधिकार प्रदान किया जो परंपरा आज भी कायम है। इसलिए मेनार के इतिहास के लिये यह शब्द कहे गए है :-

जमराबीज “मेणार” में, ओज तेज अपार।
धन्य होई एतास में, एकलिंग धरा “मेवाड़”।।
काट भगाया तुरकां ने, पाँच हासा खूंखार।
जण्या माई “वीरां” ने, झुंझ गया झुंझार।।
खड्गां रण ख़ंणकावता, करता मुगलां चौकी मेट।
ढमाके बामण खेलता, करग्या मुगलां रो आखेट।।
मोल कहे तुरकडो, जजियो दियो लगाय।
सिर हाटे भूमि मले, कटिया थूं कदी न पाय।।
निश्चिन्त रहो थें राणा, ओ पातशा कोई तोप।
भारी पड़ग्यो मुगलां पे, मेणार बामणा रो कोप।।

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