बाण माता मंदिर में अष्टमी हवन पुर्णाहुति के साथ हुआ सम्पन्न

उदयपुर जिले के मेड़ी स्थित मेवाड़ राजवँश कुलदेवी बाण माता मंदिर में अष्टमी पर हवन पूर्णाहुति का कार्यक्रम संपन्न हुआ ।

वक्त बदलता है, पीढियां बीत जाती है परंतु परम्पराएं नही बदलती आपकी परंपरा आपको विरासत में मिली धरोहर है,हर वर्ष की भांति इस परंपरा को निभाते हुए कुलदेवी बाण माता मंदिर मेड़ी मेंअष्टमी पूर्णाहुति करने हेतु का सौभाग्य प्राप्त हुआ चित्तोड़ री धणियाणी है रहे राणा मन रंग जोगण जगदम्ब मेवाड़ री माँ बायण ने रंग नाम ले नामी भया बाज्या दीवान एकळंग ।
उण राणा री इष्ट जो वा बायण ने रंग सेव्या सदा सिसोदिया मही बधायो माण धनुष बाण धारण करीया बण तु माता बायण
सिसोदिया वंश की कुलदेवी का नाम ”बायण माता” है, जिन्हें बाण माता या ब्राह्मणी माता भी कहते हैं l इतिहासिक सूत्रों के मुताबिक सिसोदिया-गुहिलो ­त वंश की कुलदेवी का नाम बायण माता इसलिए है क्योंकि जब हमारे पूर्वज सौराष्ट्र[गुजरा ­त] से यहाँ चित्तोड़गड़ आए तब वहां गुजरात में नर्मदा नदी से जो पाषाण निकलते थे उनसे शिवजी की जोस्थापना होती थी उन्हें बाण-लिंग कहा जाता था, जिनके नाम से मेवाड़ में बाणेश्वर्जी का मंदिर भी है l उन्ही बाणेश्वर महादेव की देवी पार्वती जी का एक अंश माँ बायण के रूप में प्रकट हुआ मानते हैं जिन्होंने प्राचीन काल में बाणासुर देत्य का वध किया था और इसी लिए माँ दुर्गा का वह स्वरुप बायण माता के नाम से विख्यात है l जिनके उपासक सिसोदिया वंश के सभी कुल हैं जिनमे शक्तावत कुल भी हैlमेवाड़ में माँ बायण की प्राचीन मूर्ति एक पुरोहित परिवार के पास रहती है जो की नागदा जाती के ब्राह्मण हैं यह व्यवस्था इसलिए स्थापित की गयी थी क्यूंकि मेवाड़ के कई महाराणाओ को शत्रुओं से युद्ध के लिए महलों से बाहर रहना पड़ता था और किलों पर दुश्मन का कब्जा होने पर बायण माता की मूर्ति को खतरा होने की वजह से ही नागदा ब्राह्मणों को इसकी जिम्मेदारी दी गयी थी
एतिहासिक स्त्रोत यह भी साबित करते हैं के बायण माता के नवमी के दिन बकरे की बलि नहीं दी जाती क्यूंकि यह सात्विक देवी हैं जो बलिदान दिया जाता है वह माँ दुर्गा के ही तामसिक स्वरुप कालीका माता के चडाया जाता है साथ ही यह बलिदान कहीं कहीं भेरू जी के नाम से भी चडाया जाता है किन्तु माता बायण सात्विक ही रहती हैं यह बताना मुश्किल है कीयह अपभ्रंश कब और कहा से शुरू हुआ के सिसोदिया बायण माता के नाम से बलि देने लगे सिसोदिया शक्तावत कुल देवी की सात्विकता का एक सबसे बड़ा प्रमाण यह है के माता के सामने बलिदान न होकर कही आड़ में मंदिर से बहार किया जाता है l यह रीती तो लगभग सम्पूर्ण मेवाड़ आदि के शक्तावत पालन करते है किन्तु अधिकतर ठिकानो में माताजी के बलिदान चडाया जाता है, एक बार शुरू होने से अब बंद करने से सभी शंकित होते है l किन्तु ऐसे भी कई ठिकाने हैं जहा आज भी बलिदान भेरूजी या कालीका माता के नाम से होता है और बायण माता को बिलकुल सात्विक रखा जाता है l
कुलदेवी माँ बायण का मंदिर भट्टी में बने केलु और बांस की कच्ची छत और दीवारों/जमीन को गौ माता के गोबर और ठिकाने के खेत की मिटटी से लीप कर बनाया जाता है l इसी में माताभि खुश रहती हैं l मंदिर की छत पर यदि ध्वजा फेहराई जाये तो यह ध्यान रखा जाता है की उसकी छाया किसी भी घर पे नहीं पढनी चाहिए अन्यथा उस घर-परिवार का नाश हो जाता है

रिपोर्टर जितेंद्र पंचोली

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