बांसवाड़ा में 2.59 करोड़ के लिए कांस्टेबल जीजा की सड़क हादसे में मौत की पुलिसकर्मी साले ने रची झूठी कहानी, कोर्ट ने बीमा क्लेम किया खारिज
बांसवाड़ा,डीपी न्यूज नेटवर्क । कांस्टेबल जीजा की सड़क हादसे में मौत की झूठी कहानी गढ़कर पुलिसकर्मी साले ने 2 करोड़ 59 लाख 40 हजार रुपए का बीमा दावा पेश किया। पुलिसकर्मी साले ने कहानी के झूठे गवाह, किरदार और अस्पताल में इलाज चलने की स्क्रिप्ट भी लिख ली, लेकिन दस्तावेजों के अवलोकन और गवाहों के बयानों पर कोर्ट में झूठ पकड़ा गया। इस पर हादसे और इससे मौत की कहानी पर संदेह जताते हुए मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण के न्यायाधीश अभय जैन ने बीमा क्लेम खारिज कर दिया। खास बात यह है कि परिवादी कांस्टेबल साले ने हादसे के 107 दिन बाद रिपोर्ट दर्ज कराई थी। प्रकरण में कई पहलू ऐसे थे, जिनमें हादसे को लेकर संदेह पैदा हो रहे थे। दावे के मुताबिक घटना 20 जून, 2020 की बताई। परिवादी गढ़ी निवासी कांस्टेबल दिलीप कुमार (सदर थाना) ने बताया कि शाम 6:30 बजे जीजाजी के घर गढ़ी से ऑन ड्यूटी पुलिस लाइन बांसवाड़ा आ रहे थे। जीजाजी प्रभुलाल की बाइक प्रार्थी दिलीप चला रहा था। करीब साढ़े 7 बजे बोरवट बस स्टैंड के पास पहुंचे थे कि सामने से एक मोटर साइकिल चालक गलत साइड से आया और प्रभुलाल की बाइक को टक्कर मार दी। जिससे वह बाइक समेत रोड पर गिर पड़े। जिससे प्रभुलाल को सिर व शरीर पर जगह- जगह चोटें आई। वहां मौजूद लोगों ने इलाज के लिए निजी वाहन से एमजी अस्पताल भर्ती कराया।
11 अक्टूबर की सुबह 9 बजे प्रभुलाल की मृत्यु हो गई। इलाज में व्यस्त होने से रिपोर्ट देरी में हुई। इसके बाद 11 अक्टूबर को एफआईआर दर्ज कराई। इस वजह से भी बीमा कंपनी को संदेह था कि फर्जी क्लेम उठाने का प्रयास किया जा रहा है। मामले में कोर्ट में बीमा कंपनी की ओर से पेश किए दस्तावेजों में बताया कि मृतक प्रभुलाल की पत्नी ने अपने बयान में पति के एमजी अस्पताल में 15 दिन भर्ती रहने, जबकि बेटी ने 40 दिन भर्ती रहना बताया। मृतक की पत्नी और बेटी ने प्रार्थी दिलीप से कोई रिश्तेदारी नहीं होना बताया था जबकि दिलीप उनका पड़ोसी है और दिलीप ने रिपोर्ट में प्रभुलाल को जीजा बताया था।
वहीं प्रार्थी की ओर से निजी अस्पताल का एक सर्टिफिकेट पेश किया, जबकि दस्तावेजों में मृतक का एमजी अस्पताल में ही इलाज कराने की बात कही गई थी। इसे लेकर कोई दस्तावेज पेश नहीं किए। इसी प्रकार निजी अस्पताल का फर्जी प्रतिवेदन तैयार किया। जांच में यह भी सामने आया कि जो चश्मदीद गवाह प्रार्थी दिलीप कांस्टेबल के कोई बयान ही नहीं हुए। इससे प्रार्थी के फर्जी क्लेम उठाने का संदेह सामने आया। इसके बाद क्लेम खारिज किया।
