18 जैन बालकों का उपनयन संस्कार, छठा आचार्य पदारोहण दिवस मनाया : जैन धर्म की गरिमा आचरण से बढ़ा करती है: पुलक सागर
ऋषभदेव,डीपी न्यूज नेटवर्क । भट्टारक यशकीर्ति गुरुकुल जैन मंदिर के परिसर में भारत गौरव राष्ट्र संत आचार्य पुलक सागर जी महाराज ससंघ के सान्निध्य में शुक्रवार को आचार्य पुलक सागर जी महाराज का छठा आचार्य पदारोहण दिवस मनाया गया। इस दौरान जैन छात्रों का उपनयन संस्कार कार्यक्रम भी संपन्न हुआ। कार्यक्रम की शुरुआत दिगंबर जैन तीर्थ रक्षा कमेटी के प्रदेश अध्यक्ष राजकुमार कोठारी, एडवोकेट हेमंत सोगानी व एडवोकेट विजय चौधरी ने दीप प्रज्जवलन से की। बालकों का उपनयन संस्कार आचार्य के सान्निध्य में प्रतिष्ठाचार्य सुधीर मार्तण्ड की ओर से मंत्रोच्चार किया गया। सभी बच्चों ने मुंडन करवाया। कई बच्चों ने प्रथम बार जिन प्रभु का अभिषेक किया और शांतिधारा की बालकों को सभी व्यसनों का त्याग कराया गया। उनके गले में जनेऊ डलवाए गए व हाथ में कलावा पहनाया गया। फिर उन्हें प्रतिदिन मंदिर जी के दर्शन व रात को भोजन के त्याग करने का नियम भी याद दिलवाया गया। साथ ही कहा कि प्रतिदिन एक बार माला अवश्य फेरनी होगी। भोजन करने से पहले नौ बार ण्मोकार मंत्र का जाप करें। इसके बाद आचार्य श्री का छठा आचार्य पदारोहण दिवस मनाया गया, जिसमें आचार्य श्री की स्थानीय समाज के कार्यकारिणी सदस्य, हुमड़ समाज तरुण क्रांति मंच अदिनाथ एकता मंच युवा परिषद पुलक मंच महिला मँच नागदा समाज की ओर से अष्टद्रव्य सजाकर संगीतमय पूजा की गई। पाद प्रक्षाल ऋषभ कुमार, नंदलाल भंवरा परिवार एवं शास्त्र भेंट उदयपुर निवासी नीलकमल अजमेरा परिवार को लाभ मिला। संचालन क्षुल्लिका प्रिय दर्शना एवं प्रियमंगला माताजी ने किया। उपनयन संस्कार मोक्ष जाने में निमित्त बनेगा भारत गौरव राष्ट्र संत आचार्य पुलक सागर जी महाराज ने प्रवचन में कहा कि आपके बच्चों को सत्ता, संपत्ति, सिद्धि मिले, प्रसिद्ध मिले और इसके साथ ही उनकी जिंदगी को बचाना है तो उपनयन संस्कार अवश्य करवाएं। उन्होंने कहा कि उपनयन संस्कार मोक्ष जाने में निमित्त बनेगा। छोटी उम्र का ये संस्कार हर प्रतिकूलताओं में काम आता है। इस संस्कार के माध्यम से सरस्वती की कृपा इन बालकों पर बनी रहेगी । व्यसन मुक्त समाज का निर्माण करवाना हमारी जवाबदारी है।
जैनधर्म की गरिमा आचरण से बढ़ती है – आचार्य पुलक सागर
आज का दिन स्मरणीय हो गया। क्योंकि जैन धर्म की दीक्षा ली और जैन धर्म के लिए जीवन समर्पित कर दिया। पहली बार यह कार्यक्रम मेरे हाथों से हुआ और आगे जाकर विराट रूप लेगा। व्यसन मुक्त समाज हो, जैनाचार्य का पालन करे। जैन धर्म की गरिमा आचरण से बढ़ती है। आचरण सबसे बड़ी चीज है। एक आचार्य का काम आचरण से होता है। मैं इस योग्य नहीं हूं इस पद को निभा पाना कठिन है। मेरी इस योग्यता को किसी ने दुबारा जागृत किया है। तो मेरे गुरु पुष्पदंत सागर महाराज है, लेकिन इतना में जानता हूं कि एक अच्छा शिष्य बनने लायक हूं उनका जीवनभर शिष्य रहूं, उनकी शिष्यता को स्वीकार करता रहूं तो मेरा जीवन सफल हो जाएगा।
