उदयपुर फिल्म फेस्टिवल का तीसरा दिन रहा गाँधी के नाम
सलूंबर जिला ब्यूरो चीफ,नितेश पटेल । 8वें उदयपुर फ़िल्म फेस्टिवल के तीसरे दिन काफी चहल पहल रही।सुबह के सत्र की शुरुआत दो प्रभावी और यादगार लघु संगीत वीडियो के द्वारा की गई। यह फेस्टिवल तेलंगाना के क्रांतिकारी कवि, गीतकार और संगीतकार गद्दर को समर्पित किया गया है । उनकी याद को ताजा करते हुए प्रसिद्ध फिल्मकार अमर कंवर के बनाए हुए ‘ए नाइट ऑफ़ प्रोफेसी’ के अंश गीत – ‘आग है ये आग है’ ने लोगो को प्रतिरोध की ऊर्जा से भर दिया और हाल ही में इस दुनिया से दूर हुए गद्दर की याद ने आंखों को नम भी कर दिया। दूसरा म्यूजिक वीडियो वरुण ग्रोवर द्वारा निर्देशित और इंडियन ओशियन म्यूजिक बैंड द्वारा बनाया गया जादुमाया वीडियो दिखाया गया। यह वीडियो एक प्रयोगात्मक रूप से एनीमेशन का सटीक इस्तेमाल कर युवाओं को सीधा देश में चल रहे विरोधाभास से जोड़ती है।
2 अक्टूबर गांधी जयंती पर आयोजित सुबह का सत्र, गांधी जी के जीवन से जुड़े लोगो, दस्तावेजों और मुद्दों के नाम रहा । इस सत्र में पहली फिल्म ‘मारू जीवन एज मारी वाणी (मेरा जीवन ही मेरा संदेश)’ दिखाई गई। इस फिल्म में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में शामिल रहे दो गांधीवादी विचारकों दत्ता गांधी और उनकी सहभागी आशा गाँधी के जीवन को और उनके स्वतंत्रता संग्राम में योगदान को उनके बातचीत में दिखाया गया। इस फिल्म का सबसे असाधारण पक्ष यही रहा की साधारण तरीके से साधारण जीवन जीते हुए आज के समय में भी किस तरह से लगातार दत्ता गांधी संवैधानिक मूल्यों की और गांधीवादी विचारो की साम्प्रदायिक ताकतों से लड़ाई वयोवृद्ध होने के बावजूद लड़ते रहे। संतोष पठारे द्वारा निर्देशित इस फिल्म ने दर्शकों के मन को छू लिया और बातचीत लंबी चली जिसमें निर्माता स्मिता गांधी और सह निर्माता प्रग्न्या जोशी ने इस फिल्म की निर्माण की छू प्रक्रिया पर बातचीत की।
सुबह के सत्र की दूसरी फिल्म ‘हू किल्ड गांधी’ ने दर्शकों को भीतर से उद्वेलित कर वर्तमान परिस्थितियों पर सोचने पर मजबूर कर दिया। निर्देशक आनंद रमैया की यह फिल्म नाथूराम विनायक गोडसे और उनके पथ प्रदर्शक विनायक दामोदर सावरकर गांधी जी की हत्या में गहरे रूप से शामिल होने की दस्तावेजी पड़ताल करती है। गांधी जी के प्रपोत्र तुषार गांधी उन सभी जगहों, दस्तावेजों से हमे ले गुजरते है जो फासिस्ट योजनाओं में शामिल सावरकर और गोडसे के निजी और राजनैतिक जीवन से जुड़ी है। फिल्म शोधकर्ता फराहतुल्ला बेग से हुई बातचीत में दर्शको ने फिल्म में दिखाई गई छद्म राष्ट्रवादी और साम्प्रदायिक ताकतों के प्रति अपना गहरा विक्षोभ जाहिर किया और जिस तरह से इस फिल्म के द्वारा उन सभी हिस्सों को संवेदनात्मक रूप से दर्शाया गया उस पर संतोष भी जाहिर किया। दस्तावेजों के संयोजनात्मक पक्ष पर सवाल पूछे जाने पर फराहतुल्ला बेग ने कहा की इन दस्तावेजों के संकलन में तो अधिक दिक्कत नही हुई पर चूंकि ब्रॉडकास्टिंग की समय सीमा निर्धारित थी तो उन्हें कई महत्वपूर्ण दस्तावेज छोड़ने पड़े। यह कहते हुए उन्होंने माना की कई जगहों पर फिल्म की आलोचनात्मक धार और तेज हो सकती है जिसके लिए वे भविष्य में प्रयासरत होंगे।
दोपहर के सत्र में वरुण सुखराज की किसान आंदोलन पर बनी ज्वलंतशील दस्तावेजी फिल्म ‘टू मच डेमोक्रेसी’ दिखाई गई । इस फिल्म में दुनिया के सबसे बड़े और कोविड जैसी मुश्किल परिस्थितियों में सब कुछ दांव पर लगाकर दिल्ली की सीमा पर जूझते उन किसान संगठनों और परिवारों की परिस्थिति बताई गई जो नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा कॉरपोरेट हित में लाए गए तीन काले कानूनों के खिलाफ उठ खड़े हुए। वरुण सुखराज की उपस्थिति में एक महत्वपूर्ण बातचीत दर्शकों से हुई ।
इस प्रकार तीसरे उदयपुर फिल्म फेस्टिवल में इन तीन फिल्मों के जरिये आज गांधी जयन्ती को एक अलग अंदाज़ में बनाया गया। दूसरे सत्र की फिल्म थी किसलय की कथा फिल्म ‘ ऐसे ही.. ‘ थी। किसलय निर्देशित कथा फ़िल्म ‘ऐसे ही’ एक शहर के एक समय के बदलने की कहानी है. किसलय फ़िल्म संस्थान पुणे से सम्पादन के कोर्स के स्नातक हैं और वहां के छात्र आन्दोलन का सफल नेतृत्व भी कर चुके हैं।
समारोह की अंतिम फ़िल्म अनामिका हक्सर की ‘घोड़े को जलेबी खिलाने जा रिया हूं’ थी। उदयपुर के लोगों को अपने महबूब कहानीकार आलमशाह खान की याद होगी। मध्यवर्गीय रूमानियत से घिरी हुई हिंदी कहानी के संसार में वे तलछट की ज़िंदगी जीने वाले हाशिये के लोगों को केंद्र में लाए थे। ‘घोड़े को जलेबी खिलाने जा रिया हूं’ सिनेमाई पर्दे पर वही काम करती है। तांगे वाले, जेबकतरे, कचरा बीनने वाले, उठाईगीरे, सड़कछाप गाइड – वह पुरानी दिल्ली का दूसरा चेहरा हमारे सामने लेकर आती है, वह दूसरा चेहरा जिसे विदेशी मेहमानों के आने पर मोटे पर्दों से ढँककर छुपाया जाता है। छुपाया जाता है. क्योंकि गरीबी शर्म का बायस है। गरीबी न शर्म का बापस है न दया का ‘घोड़े को जलेबी खिलाने जा रिया हूँ दया की पलायनवादी दृष्टि नहीं है बल्कि वह इस गरीबी के कारणों की पड़ताल करने वाली सजग दृष्टि है। रंगकर्मी अनामिका हक्सर के सात वर्ष लंबे शोध और दिल्ली के जुनूनी रंगकर्मियों की टोली के समर्पण का परिणाम है।
आठवें उदयपुर फिल्म फेस्टिवल की ख़ास बात को चिन्हित करते हुए इसकी संयोजक रिंकू परिहार ने कहा कि इस बार का फेस्टिवल इस लिहाज से खास रहा कि राजस्थान और दूसरे और राज्यों से शामिल हुए युवा सिनेमा प्रेमियों ने अपने -अपने इलाकों में इस सिनेमा अभियान को अपने यहाँ शुरू करने का मन बनाया।
